कुंडली के कई दोषों में 'पितृ दोष' ऐसा है, जिसकी चर्चा सबसे अधिक होती है। वैदिक अवधारणा के अनुसार पितृ दोष का असर जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे- करियर, विवाह, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक खुशहाली, वंशवृद्धि और व्यक्तिगत विकास आदि पर पड़ता है। कई बार ऐसा होता है कि, काफी कोशिशों के बाद भी जीवन में रुकावटें आती है, घर-परिवार में कलह-क्लेश रहता है, घर पर मांगलिक कार्य संपन्न नहीं हो पाते। ऐसी स्थिति में लोगों को लगता है कि, कहीं ये सब कुंडली में पितृ दोष के कारण तो नहीं हो रहा?
पितृ दोष भले ही कुंडली के गंभीर दोषों में एक है, लेकिन इसे सजा या श्राप नहीं माना जाता है। कई ज्योतिषाचार्यों का ऐसा मानना है कि, कुंडली में पितृ दोष पूर्वजों के कर्मों के उन प्रभाव को दिखाता है, जिन पर ध्यान देने, सुधारने या आध्यात्मिक संतुलन बनाने की जरूरत हो सकती है। पितृ दोष के बारे में सही जानकारी ही इससे जुड़े बेवजह भय को दूर कर सकती है। पितृ दोष के बारे में आगे पढ़िए, आपको सही मार्गदर्शन मिल सकता है।
पितृ दोष मुख्यतः ग्रहों के प्रभाव, पूर्वजों के कर्म और अपने कर्मों के फल के कारण हो सकता है। साधारण शब्दों में कहें तो, जिनके पूर्वजों ने अपने जीवन में कोई अपराध, गलती या कोई गलत कार्य किया हो, उनकी कुंडली में पितृ दोष हो सकता है। इसके अलावा ग्रहों की कुछ युति या स्थिति से भी कुंडली में इस दोष का निर्माण होता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को पिता का कारक माना जाता है। कई बार कुंडली में जब सूर्य नौवें भाव में स्थित है या लग्न में किसी अशुभ ग्रह से पीड़ित है तो भी पितृ दोष हो सकता है।
कुंडली में पितृ दोष है या नहीं इसका पता ज्योतिषी व्यक्ति की जन्म कुंडली में ग्रहों की खास स्थितियों और भावों का अध्ययन करके पता लगाते हैं। पितृ दोष का पता लगाने के लिए खासतौर पर सूर्य, राहु, केतु, नौवां भाव, पांचवां भाव और बृहस्पति को देखा जाता है। पितृ दोष के मुख्य कारण हैं-
हालांकि, सिर्फ इन योगों के होने से ही गंभीर पितृ दोष का पता नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए जानकार ज्योतिषी शुभ ग्रहों, कुंडली के पूरे संतुलन और ग्रहों की दृष्टियों की जांच करते हैं। कुंडली में पितृ दोष है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए या अंतिम निर्णय लेने से पहले किसी ज्योतिषी से कुंडली का विस्तार से विश्लेषण करवाना चाहिए।
ऐसी मान्यता है कि, पीढ़ियों से परिवार के प्रति कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का सही तरीके निर्वहन न करने या इसे अनदेखा करना पर पूर्वजों से जुड़े असंतुलन पैदा हो सकते हैं।
अमावस्या तिथि या पितृ पक्ष में पूर्वजों से जुड़े अनुष्ठान जैसे पितृ कर्म, तर्पण, श्राद्ध या पिंडदान आदि करना से भी पितृ नाराज हो सकते हैं, जिससे पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है।
ज्योतिष में सूर्य को पिता, वंश और पूर्वजों के आशीर्वाद का प्रतीक माना गया है। इसलिए कुंडली में जब सूर्य पर राहु, केतु या बुरे प्रभावों का असर होता है, तो पितृ दोष की संभावना बढ़ सकती है।
कुंडली का नौवां भाव पूर्वज, आशीर्वाद और पारिवारिक परंपराओं का प्रतीक है। इस भाव पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों के संबंध को पूर्वजों के कर्मों से जोड़ा जाता है।
हालांकि कुंडली में पितृ दोष की मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए ज्योतिष कुंडली का अच्छे से विश्लेषण करते हैं। इनमें से किसी घटना ना होना जरूरी नहीं है।
कई लोग ऐसा मानते हैं कि कुंडली में पितृ दोष का मतलब है कि, जीवन मुश्किलों से भरा रहेगा। लेकिन यह सच नहीं है। पितृ दोष होने पर भी कई लोग खुशहाल और संतोषजनक जीवन जीते हैं। कई बार जीवन की मुश्किलों के अन्य व्यवहारिक और ज्योतिषीय कारण भी हो सकते हैं।
पूर्वजों के सम्मान, श्राद्धकर्म, पिंडदान, तर्पण और उपाय आदि से पितृ दोष को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्त्री पितृ दोष तब लगता है जब कुल की किसी स्त्री जैसे- दादी, माता या अन्य किसी महिला का अनादर हुआ है या मृत्यु के बाद उनके निमित्त श्राद्ध कर्म न किए गए हों।
शास्त्र के अनुसार, प्रतिदिन पितरों की पूजा कर सकते हैं। लेकिन नियमित संभव न हो तो कम से कम अमावस्या, संक्रांति और पितृपक्ष के दौरान पितृ पूजन जरूर करें।
पितृ दोष की पूजा परिवार के मुख्य सदस्य खासकर पुरुष द्वारा की जानी चाहिए। लेकिन परिवार में पुरुष न हो तो स्त्री भी इस कर्म को पूरा कर सकती हैं।
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